चरित्र निर्माण

उठो द्रौपदी वस्त्र संभालो
अब गोविन्द न आएँगे
तुम्हारे वस्त्र से हीं लोग तुम्हे परख कर जाएंगे
तुम अपना चरित्र प्रमाण साथ लेके चलना वरना लोग पता नहीं तुम्हे कुछ और समझ जाएंगे
तुम पाक हीं सही पर तुम्हारे वस्त्र ही तुम्हारे साक्षी हैं
इन लोगों का पता नहीं कब क्या कह जाएंगे

वस्त्र से तुम्हारा चरित्र नापने वाले लोग उस दुशाशन से कम नहीं
पर अब तुम्हारा चरित्र निर्माण करने वो गोविन्द न आएंगे
उस दुशाशन ने सिर्फ तुम्हारे वस्त्र उतारे थे पर अब ये लोग तुम्हारा चरित्र निर्माण करेंगे
तुम पुछोगी कौन हैं ये और इनको मुझसे क्या
पर  इस सवाल का जवाब देने तुम्हारे गोविन्द भी न आएँगे

तुम कहोगी मैंने कौन सी गलती कर दी
 मैं क्या मात्र एक वसतु बन गयी
पर सुन द्रौपदी तेरे ऊपर लगे हुए सर्टिफिक्ट का जवाब देने अब गोविन्द न आएँगे

तू तो इनको जानती भी नहीं
 न हीं इनसे तेरा कोई वास्ता है
पर राह चलते चलते इनको जरूर तेरे वस्त्रो सेे झांकता हुआ तेरा इतिहास दिखता होगा
पर हां द्रौपदी तेरे इन सवालो के लिए तेरे गोविन्द भी न आएँगे

तू लाख मनाले तू लाख समझाले पर इन्होंने न तेरी सुननी है और न ही तेरी माननी है
पर हाँ तेरी हर चीख पे अब तेरे गोविन्द न आएँगे

अच्छा हुआ तू आज नहीं है
वरना क्या भरोसा इनका जो तेरे प्रेम प्रसंग का उपहास बनाने में ये कुछ कसर न छोड़ते
तू तो बस एक स्त्री है ये तो पांडवो को भी न छोड़ते

सुन द्रौपदी अब मूक बनके
लोगों के कटाक्ष सुनके क्या अभी भी तुझे उस गोविन्द की आस है
इन बहिरों के लिए तेरी एक आवाज़ काफी है
इनमे से तेरा गोविन्द कोई नहीं जो तेरी अवाज़ पे तेरी गुहार सुनेगा
क्या तुझे अभी भी लगता है इनमे से कोई तेरा बनेगा !

लाख इंद्रप्रस्थ जीत ले
तू द्वारका भी ले ले
पर अब तेरी एक आवाज़ पे तेरे गोविन्द न आएँगे


Due credit to the poet who inspired the first few lines which i got on Facebook


Comments

Abhilasha said…
Amazinggg.. Very nicelyy expressed!!
Unknown said…
Very nice and meaningful thought.
Unknown said…
Very nice and meaningful thought.
Saurabh Vijay said…
a writer's vision is above the restrictions of the language, common thoughts n perspectives. very well written. keep enlightening us !
Unknown said…
एक सुझाव उन द्रौपदी के लिए जो आज भी इस भृम में है कि उनके गोविंद रक्षा हेतु आएंगे...आज होता है तो रोज सीता हरण और द्रौपदी का चीरहरण पर ना तो राम आते हैं और ना ही गोविंद इसलिए
उठो द्रौपदी वस्त्र संभालो अब गोविन्द न आएँगे
खुद ही अपनी लाज बचा लो अब गोविंद न आएगें।
Unknown said…
a must read article by every individual...... people need to understand.... good work

Anonymous said…
a very nice article which reflects the mindset of the contemporary society
Unknown said…
Literally, the first time i was so intrigued by a poem in hindi. Fascinating and intellectual. thumbs up
Saurov Pandey said…
Thank you for the bosst up
Saurov Pandey said…
Thank you so much love
Saurov Pandey said…
Thank you bhai.. more you write, more i will write. I see you as an inspirational competitor
Saurov Pandey said…
Thank you.. such praises inspire me.. thank you again
Unknown said…
Awesome.....
Saurov Pandey said…
Thank you so much

Popular Posts