वक़्त की दौड़

कभी उसी कैंटीन में खाने को तरसते थे
कभी उसी कैंटीन में खाली बैठे दोस्तों के साथ शाम गुजरती थी
आज पैसे हैं पर वो कैंटीन नहीं
आज समय भी नहीं और ना हीं वो दोस्त

सोचा था क्या मैं इस होटल में कभी खा पाऊंगा
क्या कभी उस दूसरे कोने दोस्तों के साथ छुट्टियां मना पाउँगा
आज जेब में हैसियत तो है पर वो कॉलेज के सामने वाली थड़ी नहीं
अब जेब में सब ख्वाहिश पूरा करने के लिए बैंक बैलेंस भी है पर वो दोस्तों के साथ बैठ के बनाये हुए ढेरों सपने नहीं हैं

कहीं कुछ तो बदल गया है
पर ये समझ नहीं आता शायद वो समय निकल गया है
शायद इस वक़्त की दौड़ ने हीं सबको अपने वश् में किया हुआ होगा
तभी आजकल सब बदला हुआ है

पहले तो ना समझ थी ना हीं किसी के सोच
आज बड़ी सोच भी है और समझ तो औरों के समझ से परे है
पर शायद कुछ अलग सा लगता है , सब कुछ बदला सा लगता है
ये वक़्त की दौड़ हमसे है या हमारी दौड़ वक़्त से
यही समझने में वक़्त निकलता है

Comments

Saurabh Vijay said…
thoughtful n very well scripted ! keep writing :-)
Unknown said…
great lines... reality of life..

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